ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

पीटकर हत्या करने की समस्या का गलत आकलन

पर्याप्त क्षमता नहीं रखने वाली और राजनीतिक कार्यपालिका के अधीन काम करने वाली पुलिस बल अपराधों की जांच करने और सजा सुनिश्चित कराने में नाकाम साबित होती है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

5 अप्रैल, 2017 को पहलू खान को दिनदहाड़े 200 लोगों ने पीटा था। इसके दो दिन बाद घायल पहलू खान की मौत हो गई।



17 जुलाई, 2018 को तहसीन पूनावाला ने एक याचिका दायर करके भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं पर दिशानिर्देश बनाने की मांग की। ताकि इस तरह की घटनाएं कम हो सकें और दोषियों को कानून के हिसाब से सजा मिल सके।



6 अगस्त, 2019 को राजस्थान विधानसभा ने भीड़ की हिंसा से बचाव के लिए एक कानून पारित किया। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों को कठोर सजा मिलेगी।



14 अगस्त, 2019 को अलवर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पहलू खान की हत्या के छह आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया।



पिछले दो साल की ये घटनाएं कई वजहों से गलत हैं। आपराधिक कानून पूर्वव्यापी नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट पुलिस को नहीं चला सकती। ये घटनाएं विरोधाभासी इसलिए भी हैं कि किसी एक समस्या का आकलन गलत ढंग से किया गया है और फिर उस गलत आकलन के हिसाब से उसके समाधान की कोशिशें हो रही हैं।



पहला गलत आकलन सुप्रीम कोर्ट ने पूनावाला की याचिका के बाद जारी दिशानिर्देशों में किया। 21 जुलाई, 2018 के हमारे संपादकीय में यह कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या को विशुद्ध तौर कानून व्यवस्था की समस्या माना है और ऐसी हत्याओं के पीछे के राजनीतिक मकसद को दरकिनार कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम, दलित और आदिवासी समाज के लोग ऐसी हिंसा के शिकार होते रहे। लेकिन धु्रवीकरण और वैमनस्य वाले राजनीतिक माहौल में इन हत्याओं के आरोपियों को सजा नहीं मिल पा रही है।



दूसरा गलत आकलन कांग्रेस की सरकार ने किया। कांग्रेस सरकार ने इस समस्या का समाधान कानून के जरिए करने की कोशिश की। उसने माना कि जरूरी कानूनी उपाय नहीं हैं, इसलिए ये घटनाएं हो रही हैं। लेकिन इसमें इस तथ्य को नजरंदाज कर दिया गया कि भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत पीटकर की जाने वाली हत्या हमेशा से अपराध की श्रेणी में था और इसमें मौत की सजा तक का प्रावधान है।



यहां इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि ऐसी हिंसक घटनाओं की प्रेरणा पूर्वाग्रह से आती है। इसमें एक वर्ग दूसरे वर्ग पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इसलिए इसका समाधान सिर्फ आपराधिक न्याय व्यवस्था से नहीं हो सकता।



लेकिन कुछ जरूरी सुधार आपराधिक न्याय व्यवस्था में भी करने होंगे। अब सवाल उठता है कि ये सुधार क्या हैं?



इस मामले में अदालत से छह आरोपियों का बरी किया जाना सब कुछ बताता है। इन आरोपियों को बरी करने का आदेश इस बात पर आधारित है कि जांच सही ढंग से नहीं हुई और पहलू खान की मौत की वजह पर भी भ्रम बना रहा। मृत्यु प्रमाण पत्र और पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक-दूसरे के विरोधाभासी थे। अभियोजन पक्ष पहलू खान की मौत तक की घटनाओं का क्रम स्थापित करने में नाकाम रहा।



सबसे पहले जांच का काम करने वाले अधिकारी रमेश सिंनसिनवार ने पहलू खान की मौत से पहले उनका बयान भी बेहद लापरवाही से दर्ज किया। उन्होंने यह सुनिश्चित नहीं कराया कि खान बयान देने के लिए स्वस्थ्य स्थिति में हैं या नहीं ताकि बयान का इस्तेमाल साक्ष्य के तौर पर किया जा सके। न ही उन्होंने इसकी कोई कोशिश की कि खान जिन लोगों का नाम ले रहे हैं, उन्हें उनके सामने पेश करके पुष्टि करा सकें। आगे की पुलिस जांच भी ऐसी रही और आरोपी कानून के शिकंजे से बचते चले गए।



उस घटना का वीडियो बना था और सोशल मीडिया पर इसका काफी प्रसार हुआ था। इसके बाद यह माना गया था कि इससे दोषियों की पहचान हो सकेगी। लेकिन आदेश में कहा गया है कि इलैक्ट्राॅनिक साक्ष्यों का इस्तेमाल सही ढंग से नहीं हुआ। इस बात को पता करने की कोई कोशिश नहीं हुई कि यह वीडियो कैसे बना और किस उपकरण पर इसे तैयार किया गया। वीडियो पर आने वाले अलग-अलग विरोधाभासी बयानों के बाद अदालत ने वीडियो को संदेहास्पद माना और इसके स्क्रीनशाॅट के आधार पर आरोपियों की पहचान करने को कानूनी तौर पर सही नहीं माना।



कांग्रेस सरकार ने फिर से इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं। यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन इससे भी इस समस्या का समाधान नहीं होता दिख रहा। इसमें बड़ा मसला यह है कि पुलिस और अभियोजन पक्ष के पर्याप्त क्षमता नहीं है। जिन पर जांच का जिम्मा है, वहां लोग कम हैं और राजनीतिक कार्यपालिका के अधीन काम करने की वजह से ये अपराधियों को सजा दिला पाने में सक्षम नहीं हैं।



इसका मतलब यह नहीं है कि हिंसक भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं को रोकने के लिए तुरंत कोई कदम नहीं उठाया जा सकता। गौ रक्षा के नाम पर काम करने साले संगठनों की पहचान करने और उन्हें दंडित करने से शुरुआत की जा सकती है। गौ हत्या कानून पर पुनर्विचार करना भी अच्छा कदम होगा। इस तरह के कदमों के लिए राजनीतिक पूंजी की जरूरत होगी और ये कदम राज्य स्तर पर भी उठाए जा सकते हैं। यह राजस्थान की कांग्रेस सरकार के लिए सही समय है जब वह हिंसक भीड़ की हत्या पर अपने कहे हुए पर अमल करे।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top