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कमजोर चुनाव आयोग

कमजोर चुनाव आयोग

क्या भारत निर्वाचन आयोग इस बात में सक्षम है कि वह छल से मतदाताओं को प्रभावित करने की समस्या का समाधान कर सके?
 

देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत और संरक्षण 2019 लोकसभा चुनावों के नतीजों पर निर्भर है। भारत निर्वाचन आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव सुनिश्चित कराए ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा हो सके। इन संस्थाओं में चुनाव आयोग खुद शामिल है। यह काम जटिल है। क्योंकि इनमें कई संस्थाओं के कामकाज को बुरी तरह से प्रभावित किया गया है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी खतरा मंडरा रहा है। यह आशंका भी है कि कहीं आयोग पूरी तरह से असहाय न हो जाए।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक के मामले में आयोग का अनिर्णय स्पष्ट तौर पर दिखा। दस खंडों वाली वेब सीरिज ‘मोदीः जर्नी आॅफ ए काॅमन मैन’ के मामले में भी यही दिखा। इसके पहले 2014 और 2017 में ऐसी प्रोपेगैंडा फिल्मों का मामला आया था जो मोदी का बखान करने वाली थीं। लेकिन ऐसी हर कोशिश को भारतीय जनता पार्टी का समर्थन हासिल हो जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों चुनाव आयोग स्वतः संज्ञान लेते हुए इन कोशिशों को नहीं रोकता? क्या चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता मतदाताओं को प्रभावित करने वाली इन कोशिशों को गंभीरता से नहीं लेती? अगर इसे यह गंभीरता से लेती है तो इसे रोकने के लिए क्या उपाय हैं?
 
मोदी का अभियान 2014 में भाजपा की जीत के साथ खत्म नहीं हुआ। प्रमुख मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने जब भी देश को संबोधित किया, वह लोगों को प्रभावित करने वाले उनके अभियान का हिस्सा रहा। कभी उन्होंने आधिकारिक तौर पर कोई प्रेस वार्ता नहीं की और न ही कभी उन्होंने किसी बहस में हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री ने आम लोगों की भाषा में उनके व्यवहार को प्रभावित करने की कोशिश की। अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में वे खुद को ‘सेवक’ और ‘चौकीदार’ कहते रहे। राष्ट्रीय टेलीविजन पर वे नोटबंदी के मसले पर रोते दिखे ताकि लोग उनके निर्णय के साथ खड़े हों। लेकिन नैतिक ढंग से इस तरह से लोगों के विचार को प्रभावित करने को सही माना जा सकता है? वह भी तब जब लोगों ने देश की समस्याओं और विकास से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के हिसाब से देखना शुरू कर दिया है। हर दिन सरकार को नए ‘अवतार’ में देखना अब जनता के लिए नया नहीं है। लेकिन जब तक लोगों को अपने निजी हित धर्म, कारोबार या नैतिकता के आधार पर सरकार के हित के साथ जुड़े हुए दिखते हैं, तब तक वे संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी को नजरंदाज कर देते हैं।
 
चुनाव आयोग सरकार को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने से रोकने में पूरी तरह सक्षम नहीं दिखता। यह नमो टीवी के मामले में भी दिखा और एयर इंडिया के साथ भारतीय रेल के मामले में भी दिखा। चुनाव आयोग के साथ अन्य संस्थाओं द्वारा आदर्श आचार संहिता की अनदेखी से पता चलता है कि ‘ब्रांड मोदी’ की जड़ें कितनी गहरी हैं।
 
चुनाव आयोग का रवैया एक पार्टी के पक्ष में दिखता है। इसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी के पास संसाधन सबसे अधिक हैं। इसका इस्तेमाल करके यह समाज में मतभेद पैदा करने वाला अभियान चला रही है। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी को इस बात के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया कि उन्होंने सशस्त्र बलों को ‘मोदी जी की सेना’ कहा था। राजस्थान के राज्यपाल द्वारा मोदी को फिर से प्रधानमंत्री चुनने की अपील पर भी आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। लेकिन इसके बावजूद आयोग की इन कोशिशों के बेअसर साबित होने की संभावना ज्यादा है क्योंकि मोदी के प्रचार अभियान में लोकलुभावन बातों, धर्म और पैसे का गठजोड़ बेहद मजबूत है।
 
वास्तविक गवर्नेंस और जुमलेबाजी वाले अभियानों के बीच की दूरी लगातार अस्पष्ट होती गई है। इससे गलत ढंग से मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिशें बढ़ी हैं। क्या जुमलेबाजी को लोगों को प्रभावित करने का काम नहीं माना जाना चाहिए? क्या चुनाव आयोग को फिल्म और टेलीविजन उद्योग के साथ-साथ प्रिंट मीडिया की गतिविधियों पर नजर रखना चाहिए? प्रचार अभियानों की विविधता को देखते हुए आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर नजर रखने के लिए मीडिया पर ध्यान देना पहला कदम है। चुनाव आयोग को नए सिरे से इस बात को समझना होगा कि मतदाताओं को गलत ढंग से प्रभावित करने के अलग-अलग तरीकों का समाधान कैसे किया जाए।

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