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गंगा को जीवनहीन बनाना

गंगा की आवाज सुनने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिक जिम्मेदारी दोनों की जरूरत है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

नदी होने का मतलब बहते रहना है. नदी का प्रवाह ही यह बताता है कि वह कितनी साफ है. लेकिन नदियों का प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि निर्णय करना मुश्किल है कि इनमें जीवन बचा है या नहीं. सच्चाई तो यह है कि जीवित नदियां खोजना मुश्किल हो गया है. कहीं नदियों का प्रवाह सुरंगों से निकाला जा रहा है ताकि बिजली बनाई जा सके. कहीं सिर्फ कचरा ही कचरा है. वहीं कहीं नदियों को जल आपूर्ति करने वाले पाइप की तरह एक-दूसरे से जोड़ने का काम चल रहा है. यह सब कुछ नदियों के विकास और पुनरुद्धार के नाम पर हो रहा है. हालांकि, यह पता करना मुश्किल है कि नदियों में जीवन बचा है या फिर वे जीवन रक्षक उपायों पर जीवित हैं. अगर किसी नदी के प्रवाह में इतनी बाधाएं हों तो उसे जीवित कहना मुश्किल है. ऐसे में नदियों का आंतरिक तंत्र बाधित हो जाता है.
 
वैसे तो कई नदियां खतरे में हैं लेकिन सरकार द्वारा अतिरिक्त ध्यान दिए जाने के बावजूद गंगा की स्थिति बेहद खराब है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि गंगा मईया के बुलाने पर वे वाराणसी से चुनाव लड़े. हिंदुत्व की तर्ज पर गंगत्व को भी इस्तेमाल करने की कोशिश की गई. जबकि गंगा को साफ बनाने पर कम ही ध्यान दिया गया. इंजीनियर से पर्यावरणविद बने और बाद में साधु बन गए जीडी अग्रवाल का निधन 112 दिन के अनशन के बाद हो गया. उन्हें यह उम्मीद थी कि गंगा के सवाल पर किए जा रहे उनके अनशन से प्रधानमंत्री इस मसले पर ध्यान दे पाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. अग्रवाल जो मांग उठा रहे थे, वे मांगें बहुत पहले से उत्तराखंड में उठ रही हैं. रेत खनन और पनविद्युत परियोजनाओं को बंद करने की मांग वे उठा रहे थे. क्योंकि इनकी वजह से गंगा का प्रवाह कई जगह बाधित हुआ है. गंगा के स्रोत हिमालय की सेहत भी दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है. ऐसे में गंगा को अविरल और निर्मल कैसे बनाया जा सकेगा? 20,000 करोड़ रुपये की निर्मल गंगा अभियान में यही वादा किया गया है. इसके तहत गंगा के व्यापक पुनरुद्धार की योजना बनाई गई है. जबकि सच्चाई यह है कि गंगा में न्यूनतम प्रवाह भी नहीं बचा है ताकि यह नदी का स्वरूप बनाए रख सके. इसके क्रियान्वयन की तीव्रता में भी बदलाव होते रहता है.
 
जमीनी स्थितियों को समझते हुए ठोस कदम उठाने के बजाए प्रधानमंत्री दूसरे ही दिशा में जाते दिखते हैं. वे बड़े काॅरपोरेट घरानों के हितों के साधने वाली बड़ी परियोजनाओं की बात करते हैं. गंगा का प्रवाह बचाए रखने, इसमें कचरा जाने से रोकने, बहुत अधिक मात्रा में पानी निकाले जाने पर रोक लगाने आदि के बजाए नदी के पुनरुद्धार को सिर्फ नदी तट को विकसित किए जाने में सीमित कर दिया गया है. इससे नदी के तट पर अतिक्रमण होगा और कंक्रीट के ढांचे खड़े हो जाएंगे और इसका व्यावसायिक दोहन होगा. दूसरे स्रोतों से पानी लाकर यह दिखाने की कोशिश होगी कि नदी जीवित है.
 
हल्दिया से वाराणसी के बीच 1,600 किलोमीटर में गंगा बहती है और यहां विश्व बैंक समर्थित 5,369 करोड़ रुपये की जलमार्ग विकास परियोजना पर काम चल रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में वाराणसी में इस मार्ग के जरिए पेप्सीको का एक कंटेनर का स्वागत किया. इसमें नदी के हुए नुकसान को दरकिनार किया गया. गंगा नदी पर 1,500 टन के जहाज के वहन की क्षमता नहीं है इसलिए कृत्रिम ढंग से यह क्षमता विकास करने के लिए बड़े पैमाने पर नदी के साथ छेड़छाड़ की गई. ये काम कारोबारी हितों से प्रभावित होकर किए जा रहे हैं. इस परियोजना के लिए गंगा की ड्रेजिंग का ठेका अडाणी समूह समेत बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया गया है. प्रदूषण के खतरों को नजरंदाज किया गया. साथ ही नदी में रहने वाले जीवों और मछुआरों के हितों की भी अनदेखी की गई. गंगा में रहने वाली डाॅल्फिन का भी ध्यान नहीं रखा गया और उन्हें विलुप्त होने के कगार पर छोड़ दिया गया.
 
नदी की सेहत का मतलब आज यह हो गया है कि इसका कितना वाणिज्यिक इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर यही रवैया जारी रहा तो फिर नदियों के और प्रदूषण और कंक्रीटों से घिरने को नहीं रोका जा सकता. गंगा के पुनरुद्धार के लिए जो नया विधेयक आना वाला है उसमें गंगा रक्षा काॅप्र्स बनाने की बात है. लेकिन इससे भी समस्या नहीं सुलझेगी. क्योंकि गंगा की स्थिति बिगाड़ने के लिए सरकार जो कर रही हैं, उन्हें रोकना सबसे पहले जरूरी है.
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