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पंजाब ईशनिंदा विधेयक एक न्यायेतर कानून है

उस पवित्र के दायरे की प्रगतिशील अधीनता ही धर्मनिरपेक्षता की आधारशिला है.

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

पंजाब में कांग्रेस की सरकार ने भारतीय दंड संहिता (पंजाब संशोधन) विधेयक 2018’ को पंजाब विधानसंभा में रखा और बाद में पारित कर दिया. इस विधेयक का इरादा धारा295-ए में संशोधन करना और गुरु ग्रंथ साहिबकुरानबाइबल और भगवद्गीता के अपवित्रिकरण को एक दंडनीय अपराध बनाना है जिसके लिए आजीवन कारावास की सजा हो सकती है. इस विधेयक का ताजा राजनीतिक संदर्भ कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के बीच का झगड़ा है. ये जानना रोचक है कि इससे पहले एसएडी की राज्य सरकार ने भी विधेयक पारित करते हुए गुरु ग्रंथ साहिब से बेअदबी को दंडनीय बनाया था. हालांकि केंद्र सरकार ने 2017 में विधेयक को इस आधार पर वापस भेज दिया था कि प्रस्तावित संशोधनों से भारतीय संविधान में प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है. मौजूदा पंजाब सरकार अपने विधेयक को सही ठहराना चाहती है क्योंकि उसने दूसरे धर्मों की पवित्र पुस्तकों को भी इसमें शामिल किया है. ये इस बात की मिसाल है कि कैसे "सर्व धर्म सम भाव" को लेकर इस सरकार की समझ ने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को ही सिर के बल खड़ा कर दिया है. धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को लेकर प्रतिबद्धता मेंउस पवित्र की प्रगतिशील अधीनता और पवित्र से लौकिक में जाने का अनवरत परिवर्तन शामिल होता है.

 

इस विधेयक में ईशनिंदा शब्द को नहीं लाया गया है लेकिन इसका जो आंतरिक तर्क है वो इसे ईशनिंदा-विरोधी कानूनों के साथ करता है. ईशनिंदा कानून एक उदारवादी लोकतंत्र के लिए संभावित खतरा हैं इसके खिलाफ मुख्यधारा के कुछ तर्क हैं जो धर्मनिरपेक्षता की अल्प समझ लेकर काम कर रहे हैं. आलोचना की एक पंक्ति विधेयक को इसलिए गलत मानती है क्योंकि पवित्र ग्रंथों की रक्षा के लिए इस दुनियावी राज्य शक्ति का उपयोग करके ये इसके पवित्र और लोकोत्तर चरित्र को मलिन करता है. इस विधेयक में सतह के नीचे मौजूद इस स्पष्ट विडंबना का खुलासा करने की कोशिश अपर्याप्त है क्योंकि ईशनिंदा कानूनों के राजनीतिक उद्देश्य को समझने में ये चूक जाती है. कुछ विचार/भाव/धारणाएं/मूल्य दरअसल आलोचना और प्रश्न के दायरे से बाहर हैं, ऐसा मान लेना तो ये तर्क करना होगा कि शक्तियों के कुछ प्रकार आलोचना और प्रतिवाद से परे हैं. पवित्रता के दायरे को पैदा करनाउसकी हदबंदी करनाउसका विस्तार करना ये सब हमेशा एक राजनीतिक (सिर्फ धार्मिक ही नहीं) रणनीति होती है ताकि जो सत्ता में है उसकी कोई अवज्ञा न कर सके. पवित्र की सुरक्षा के लिए इस दुनियावी राज्य शक्ति के प्रयोग में कोई विडंबना नहीं है क्योंकि पवित्र की सत्ता हमेशा ही लागू की जाती है ताकि इस दुनियावी सत्ता तंत्र को मजबूत किया जा सके.

 

इस विधेयक की दूसरी आलोचना ये है कि इसमें धार्मिक पुस्तकों में भगवद्गीता को शामिल करके हिंदु धर्म में भी ईश-निंदा का "यहूदी-ईसाई" सिद्धांत आयात किया गया है. इसे बहुलवाद और सहिष्णुता की परंपराओं के उल्लंघन के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि इस नजरिये में उस ऐतिहासिक तथ्य को नज़रअंदाज कर दिया जाता है कि कैसे नास्तिक/गैर-वैदिक/पाखंडी विधर्मी धाराओं के इंसानों और समूहों पर अत्याचार हुआउनका सामाजिक बहिष्कार किया गयाउन्हें निर्वासित किया गया. धार्मिक पुस्तकों से इतर जाने की जितनी भी सहनशीलता हमारे बीच मौजूद रही हैउस पर इनके अभ्यास और खासकर जाति-आधारित मानकों के अभ्यास के इतर जाने पर हुए हिंसक विरोध ने पानी फेर दिया है. इसलिए ये दूसरा नजरिया सामाजिक प्रतिबंध के उन स्त्रोतों को देखने में असफल रहता है जो ईशनिंदा कानूनों को भारतीय समाज और राजनीति में मिल सकते हैं. इन दोनों आलोचनाओं में जो बात समान है वो ये कि ये उस पवित्र के दायरे को आलोचना का सामना करने देने से झिझकती हैं. ऐसी आलोचना जिसे ईशनिंदा माना जाता है वो धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का पोषण करने के लिए जरूरी है. इस सिद्धांत के प्रति राज्य मामलों की प्रतिबद्धता का क्षरण हुआ है. अब ऐसे विधेयक के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे इन्हें समझाने में ये हिचक भरी आलोचना अपर्याप्त साबित होती है.

 

हाल के वक्त में किसी खास समुदाय की पहचान या धार्मिक आस्था से बदसलूकी को आधार बनाकर नाटकोंकिताबों और कलाकृतियों को बैन करने की मांगें लगातार बढ़ी हैं. अब तो धार्मिक पुस्तकों और जायज आलोचना को अलग करके देखने की कोशिश ही पाप का काम हो गया है. ये बम धमाकों के उन दो मामलों में स्पष्ट था जिन्हें हिंदू समूहों ने मुंबई में थियेटरों के बाहर किया था. ये धमाके तब किए गए थे जब एक लोकप्रिय मराठी नाटक चल रहा था. वो नाटक धार्मिक सत्ता के अनादर और देवताओं की खेल-खेल में मजाक उड़ाने की समृद्ध लोक परंपराओं से प्रेरित था. परंपराओं के स्व-नियुक्त ठेकेदारों को विधर्मिता की इस लोकप्रियता से गुस्सा आ गया. पंजाब विधेयक को देखकर बाकी राज्य भी विभिन्न समुदायों और समूहों की मांगों के आगे घुटने टेक सकते हैं. ऐसा विधेयक धार्मिक/सामुदायिक क्रियाओंआस्थाओं और धारणाओं की दृढ़ आलोचना करने की संभावना में बाधक बनेगा. क्योंकि ईशनिंदा कानून ये करेंगे कि समुदाय के भीतर जो भी दबंग है उसकी व्याख्या और आधिकारिकता को स्वीकार करके उसकी स्थिति और भी मजबूत करेंगे. लेकिन इससे भी बड़ा और गंभीर खतरा ये है कि ऐसा विधेयक चरमपंथी और न्यायेतर समूहों को संकेत देगा कि उनके कार्यों को अब सरकार का प्रकट और कानूनी समर्थन प्राप्त है. यही कारण है कि इस विधेयक को विजिलांते यानी न्यायेतर कानून के तौर पर देखे जाने की जरूरत है क्योंकि ये न्यायेतर हिंसा करने वाले विजिलांते समूहों के कार्यों को वैध कर सकता है. ऐसी सहजीवी प्रक्रिया के डरा देने वाले ख़ौफनाक नतीजे हमने गौ-हत्या विधेयक और गोरक्षकों की हिंसा के मामले में देखे हैं. हमारे यहां तो नफरत फैलाने वाले भाषणों और व्यक्तियों व समूहों के प्रति होने वाले हेट-क्राइम पर भी कोई सजा नहीं होती ऐसे में धार्मिक पुस्तकों को कानूनी सुरक्षा देना एक स्पष्ट संकेत है कि हमारी राजनीति और समाज के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का किस हद तक कटाव हुआ है.

 

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