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'नक्सली' का ठप्पा लगाने की राजनीति

सरकार ने बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ जो कार्रवाई की है वो अपनी प्रक्रिया में खोटी और नैतिक रूप से ज़लील करने वाली है.

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

महाराष्ट्र की सरकार ने हाल ही में कुछ नामी सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने और दो दलित बुद्धिजीवियों के घरों पर छापे मारने की जो कोशिश की है उसे जनतंत्र के रक्षक लोगप्रतिरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के तौर पर देख रहे हैं. राज्य सरकार के इस कदम से दो प्रासंगिक सवाल खड़े होते हैं. पहला ये कि सरकार को अपनी संदेह वाली सामान्य दृष्टि में "नक्सली" का ठप्पा क्यों लाना पड़ादूसरा ये कि जब गृह मंत्रालय विभाग और उसके इशारे पर चलने वाली पुलिस अपनी हदें पार करती है तो इन बुद्धिजीवियों को इसकी क्या सामाजिक और नैतिक कीमत चुकानी पड़ती है?

 

ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना का जो सत्तारूढ़ गठबंधन महाराष्ट्र में सरकार चला रहा हैवो दो उद्देश्य साधने के लिए इन बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ आरोपों का प्रेत "कानून और व्यवस्था" के नाम पर खड़ा कर रहा है. पहला ये कि 2019 के आम चुनाव उनके लिए बहुत मुश्किल रहने वाले हैं और इसी भाव से उनमें तीव्र बेचैनी हुई है जिसे दूर करने के लिए इस प्रेत को खड़ा किया गया है. इसी वजह से पहले तो विशेषकर भीमा-कोरेगांव मसले के संदर्भ में कानून और व्यवस्था की समस्या बताते हुए नक्सली नाम के प्रेत का उपयोग करने की जरूरत उनको हुई. उसके बाद मीडिया और दूसरे प्रचार तंत्र के जरिए राष्ट्रवाद के संदर्भ में इन नक्सलियों की नकारात्मक भूमिका चित्रित की जाए. यही कारण है कि सरकार के लिए जरूरी हो गया है कि वो महंगाई और सुशासन जैसे बड़े जरूरी विषयों से मध्यम वर्ग के लोगों का ध्यान भटका दे. केंद्र सरकार सामाजिक आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह असफल साबित हुई है और इसीलिए उसकी ये बेचैनी अभी और जारी रहने वाली है.

 

दूसरा ये कि केंद्र सरकार ने और विशेषकर महाराष्ट्र सरकार ने "अर्बन नक्सली" यानी शहरी नक्सली के जुमले का राजनीतिक उत्पादन करने में खुद को शामिल कर लिया है. नरेंद्र दाभोलकरगोविंद पानसरेएम एम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे तर्कवादी विचारकों और कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोपियों को हाल ही में जो गिरफ्तार किया गया उससे हिंदुत्ववादी ब्रिगेड को बड़ा झटका लगा है. इसी से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए ठीक इसी समय पुलिस की कार्रवाई बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ की गई है और ठीक इसी समय राजनीतिक रूप से उत्पादित जुमले "अर्बन नक्सल" को प्रचारित किया गया है. सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र पुलिस को जो लताड़ लगाई है उससे जाहिर होता है कि पुलिस ने अपनी योजना के तहत एक "फास्ट फॉरवर्ड" तरीका अख़्तियार किया ताकि अपने अभिकथनों को सबूतों में तब्दील कर सके जिन्हें बाद में ये पुष्ट करने के लिए इस्तेमाल कर सके कि उन्होंने इन कार्यकर्ताओं के माओवादियों से संबंध होने की जो उम्मीद की थी वो सही थी. इससे हुआ ये है कि लोगों का ध्यान भटक गया है जो कि पहले इस विषय पर केंद्रित था कि तर्कवादियों की हत्या के आरोपियों के तार हिंदुत्व ब्रिगेड से जुड़े हैं.

 

दूसरा सवाल उस नैतिक रूप से तबाह करने वाले अनुभव से संबंधित है जिसे पुलिस ने इन जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछताछ करने की पूरी प्रक्रिया का अंतर्निहित हिस्सा बनाना चाहा है. पुलिस की ये योजना स्पष्ट रूप से दिखी जो उसने हैदराबाद के एक दलित विद्वान और उनके परिवार की पूछताछ में अपनाई थी.

 

इसलिए सरकार का किसी को "नक्सली" कहना सिर्फ मौखिक नामकरण का कृत्य नहीं है. बल्कि उसके उलट इसमें अकसर ऐसे तरीके उपयोग में लाए जाते हैं जो हैरतअंगेज ढंग से डराने वाले हैं और नैतिक रूप से घटिया हैं. ये तब हैरतअंगेज ढंग से आतंकित करने वाले लगे जब एक बड़े ऑपरेशन के जरिए पुलिस की पलटन ने इन बुद्धिजीवियों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों की और कूच किया. ये उन प्रतिक्रियाओं में भी स्पष्ट था जो कुछ बुद्धिजीवियों ने अभिव्यक्त की. उन्होंने इस दौरान अपमानित महसूस किया. इस तरह के अपमान का असर ऐसा लगता है बढ़े हुए स्तर पर हुआ हैखासकर दलित बुद्धिजीवियों के लिए. बाकियों के साथ उनके लिए ये ज़लालत तब शुरू हुई जब पुलिस बिना कोई स्पष्ट प्रक्रिया अपनाए इनके घरों पर छापे मार रही थी.

 

प्रिंट मीडिया के एक हिस्से में ये प्रकाशित भी किया गया कि महाराष्ट्र पुलिस ने हैदराबाद के दलित बुद्धिजीवी के घर पर छापा मारने के दौरान उन्हें और उनके परिवार से ऐसे सवाल पूछे जो बहुत अधिक बेइज़्जत करने वाले थे. मिसाल के तौर पर कुछ सवाल ऐसे थे जिसमें से रुग्णता की बू आ रही थी. पुलिस वालों ने संकेत दिया कि अंतर्जातीय शादियां ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक आदर्शों में शर्म लेकर आती हैं. ऐसा लगता है कि पुलिस की वर्दी में भी इन कानून से बंधे अधिकारियों का जाति वाला स्वयं हावी हो गया है. इससे ये भी दिख जाता है कि नौकरशाही की व्यवस्था पुलिस के अंदर से जातिवादी गंदगी को बाहर निकालने में असफल रही है. पुलिस ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने की अपनी सोची समझी चाल में इस दलित विद्वान से भी पूछताछ करनी चाही. इस अवांछित पूछताछ का इरादा पुलिस की जातिवादी इच्छा को शांत करना था. पुलिस ने अपनी हदें पार करते हुए न सिर्फ निजता के अधिकार को भंग किया बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण एक इंसान की अटूट,शर्तरहित गरिमा के नैतिक अधिकार को तोड़ा. पुलिस की पूछताछ में जो ये नैतिक अच्छाई है उसे ताक पर रखा गया. यहां ये समझ लेना बहुत जरूरी है कि सरकार उस विरोधाभास को स्वीकार करना नहीं चाहती जो कानून और व्यवस्था पर आधारित राष्ट्र के उसके विचार में अंतर्निहित है. जैसा कि हैदराबाद के दलित बुद्धिजीवियों की दुर्दशा से जाहिर है पुलिस को राष्ट्र नाम की एक अमूर्त हस्ती की सुरक्षा करने की चिंता हैलेकिन वो असली और मूर्त मानवों को घोर तिरस्कार की जगह रखती है.

 

इस तरह के नैतिक रूप से घिनौने और राजनीतिक रूप से डराने वाले कदम से होता ये है कि सामाजिक कार्यकर्ता कमजोर लोगों के साथ खड़े नहीं हो सकते और न ही उन लोगों के साथ खड़े हो सकते हैं जिनके अधिकारों की सुरक्षा उसे करनी है.

 

Updated On : 9th Oct, 2018
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