स्वास्थ्य सेवाओं को लोक सेवा बनाने की जरूरत

भारत की सरकारों को यह समझना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाएं लोक सेवा हैं और ये सरकार की जिम्मेदारी है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने हाल में कहा कि ‘मोदी केयर’ से टीयर 3 और 4 के शहरों में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा और इससे चिकित्सा किफायती होगी. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बयान है. क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी कंपनियां वैसे काम नहीं करतीं जैसे दूसरे क्षेत्रों में काम करती हैं. स्वास्थ्य क्षेत्र में ये सेवाएं आपूर्ति के आधार पर मांग पैदा करके दी जाती हैं. आपूर्तिकर्ता इस क्षेत्र में मांग तय करता है. आम लोगों में जानकारी के अभाव की वजह से उनका इलाज करने वाला उन्हें जो सलाह देता है, उसे वे मान लेते हैं. चाहे वह कई जांच हों या कई दवाएं या फिर मेडिकल प्रक्रियाएं.

 

महाराष्ट्र के खाद्य और दवा प्रशासन ने जाने-माने अस्पतालों में चल रही गड़बड़ियों की जांच की और पाया कि एक ही कैथेटर का बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा है. जबकि पहली बार में ही इसके लिए मरीज से दो से तीन गुना पैसा वसूला जाता है. इससे गैरजरूरी तौर पर मरीजों का बिल बढ़ जाता है. यह धोखाधड़ी भी है. इससे मरीजों पर संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है. संक्रमण होने पर उन्हें और इलाज की जरूरत पड़ेगी. इससे मरीजों का खर्च बढ़ेगा और अस्पताल चलाने वालों का मुनाफा. 

 

स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में गड़बड़ियां हर स्तर पर हैं. चाहे वह रेफरल हो, जांच हों, दवा लिखना हो, आॅपरेशन करना हो, प्रत्यारोपण करना हो या फिर बीमा के नाम पर ठगी करनी हो. इन गड़बड़ियों की सूची निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है.

 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने क्लीनिकल इस्टैलिबसमेंट कानून लागू करने का विरोध कर रही है. इस कानून में स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन का प्रावधान है. आईएमए ने हमेशा से मूल्य तय करने का विरोध किया है. इसके उलट कनाडा में डाॅक्टरों के एसोसिएशन ने सरकार से कहा है कि उनकी पगार नहीं बढ़ाई जाए क्योंकि उन्हें लगता है कि वे पहले से ही अधिक पैसे पा रहे हैं.

कनाडा या दुनिया के किसी और देश के स्वास्थ्य तंत्र और भारत के स्वास्थ्य तंत्र के बीच की गहरी खाई के लिए नियमन का अभाव जिम्मेदार है. भारत में आईएमए एक पेशेवर संगठन के बजाए एक गिल्ड की तरह काम करती है. इसने हमेशा से मूल्य निर्धारण और नियमन का विरोध किया है. इसने कभी भी गड़बड़ियों में लिप्त रहने वाले डाॅक्टरों पर कार्रवाई नहीं की. न ही कभी इसने मेडिकल क्षेत्र में नैतिक मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की है. इससे भारत में अस्पताल वाणिज्यिक और मुनाफे की प्रेरणा से काम करने वाले होते गए.

 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 और आम बजट 2018-19 मंे आयुष्मान भारत के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की घोषणा की गई. इससे पता चलता है कि नरेंद्र मोदी सरकार स्वास्थ्य नीतियों को किस दिशा में ले जाना चाहती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य क्षेत्र से संबंधित निर्णय नहीं ले पा रहा है और यह काम नीति आयोग कर रहा है. नीति आयोग की सिफारिशें सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने वाली हैं. उसे हर समस्या का समाधाना बीमा आधारित माॅडल में दिख रहा है.

 

दुनिया के जिन देशों में भी स्वास्थ्य तंत्र को बेहतर बनाने का काम हुआ है, वहां इसमें उचित नियमन की खास भूमिका रही है. इनकी फंडिंग करों और सामाजिक बीमा भुगतानों के जरिए होती है. ये आय और रोजगार के आधार पर लोगों को नहीं बांटते. नैतिक मूल्यों को खास अहमियत दी जाती है. इनसे भी बढ़कर ये कि इन देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा बल्कि यह सुनिश्चित किया कि यह लोक सेवा रहे और सरकार इसकी जिम्मेदारी ले.

 

इस वक्त भारत की स्वास्थ्य नीतियों की दिशा को लेकर सवाल पूछा जाना चाहिए. क्योंकि हमारे नौकरशाहों और सांसदों को केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना यानी सीजीएचएस का लाभ मिलता है? अब तो इसके तहत भी निजी अस्पताल ही सेवाएं दे रही हैं. 2015 में औसतन हर सीजीएचएस लाभार्थी पर 6,300 रुपये खर्च हुए. जबकि पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकार औसतन 1,100 रुपये खर्च करती है. मतलब सीजीएचएस वालों पर छह गुना खर्च हो रहा है. इस समीकरण को बदलने का वक्त आ गया है. सरकार सभी को स्वास्थ्य सेवाएं देने की बात तो करती है लेकिन वह सेवाएं खांचे में बांटकर दे रही है. इससे स्वास्थ्य सेवाओं से वंचितों की संख्या बढ़ रही है.

अगर इसे बदलना है तो स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार से अलग करके इसे लोक सेवा बनाना होगा. दुनिया के दूसरे देश इसी दिशा में बढ़ रहे हैं. भारत अलग राह अपनाए, इसकी कोई जरूरत नहीं लगती. मिजोरम, सिक्किम, गोवा, पुद्दुचेरी और अंडमान निकोबार ने बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रति व्यक्ति 4,000 रुपये आवंटित करके इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि निजी क्षेत्र की मौजूदगी वहां न के बराबर है. इन जगहों पर अच्छा प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र विकसित हुआ है और इनके स्वास्थ्य संकेतक अच्छे हैं. अगर केंद्र सरकार वाकई आयुष्मान भारत चाहती है तो उसे दुनिया से और इन राज्यों से सीखने की जरूरत है. स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार के चंगुल से मुक्त कराके इसे जन सेवा बनाते हुए केंद्र सरकार को इसकी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने की आवश्यकता है.

 

 

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