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दिमागी धुंध

समस्या सिर्फ हवा की नहीं बल्कि नीतियां बनाने वाले लोगों के दिमाग की भी है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

हर साल दिल्ली में धुंध छाती है और हर साल इस पर हायतौबा मचाया जाता है. इसे आपातकाल कहा जाता है. दिल्ली की ओर से हरियाणा और पंजाब पर आरोप लगाए जाते हैं. ये दोनों राज्य दिल्ली को जिम्मेदार ठहराते हैं और फिर सब मिलकर केंद्र सरकार को कोसते हैं. इन सबके बीच राजधानी में रहने वाले लोगों के लिए सांस लेना दूभर हो जाता है. गरीब परिवारों के बच्चों और बूढ़ों के लिए दो ही विकल्प हैः या तो बगैर सांस लिए मर जाएं या फिर सांस लेते हुए मरें. ये सब सुनने में नाटकीय भले ही लग रहा हो लेकिन यही सच है. ब्रिटेन के प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लांसेट की मानें तो 2015 में भारत में प्रदूषण की वजह से 25 लाख लोगों को जान गंवानी पड़ी.

दिल्ली में इस साल धुंध की शुरुआत वैसे तो 7 नवंबर से हुई लेकिन इसका माहौल महीनों से बन रहा था. खतरे की घंटी 2002 में ही सेंटर फाॅर इनवारयरमेंट ऐंड साइंस के अनिल अग्रवाल ने बजा दी थी. उन्होंने सार्वजनिक परिवहन में डीजल की जगह सीएनजी इस्तेमाल करने के लिए संघर्ष किया. लेकिन इसके बाद दिल्ली में कुछ खास नहीं किया गया. मेट्रो रेल बना लेकिन सड़कों पर गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ती रही. डीजल से चलने वाले ट्रक शहरा में आते-जाते रहे. कचरे का खुले में जलाना जारी रहा. औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषण की निगरानी ठीक से नहीं हुई. कोयले से बिजली बनाने का काम भी आसपास में चलता रहा है और यहां से निकलने वाला सल्फर डाइ आॅक्साइड हवा को जहरीली बनाती रही. साथ ही सैंकड़ों डीजल जेनरेटर भी चलते रहे. इन सबने मिलकर दिल्ली की हवा में जहर की मात्रा को लगातार बढ़ाया.

पिछले साल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर ने अपने अध्ययन में बताया था कि गर्मियों में जब पड़ोसी राज्यों में फसल के बाद की चीजों को जलाने का काम नहीं होता तब भी दिल्ली की हवा बेहद खराब ही रहती है. सर्दियों में यह समस्या और बढ़ जाती है. इस अध्ययन में यह पाया गया कि दिल्ली के प्रदूषण में 98 फीसदी सल्फर डाइआॅक्साइड और 60 फीसदी नाइट्रोजन आॅक्साइड ताप बिजली परियोजनाओं, औद्योगिक इकाइयों, रेस्टोरंेट और डीजल जेनरेटर की देन हैं. दिल्ली से 300 किलोमीटर के दायरे में 13 ताप बिजली परियोजनाएं हैं, 20 बड़े उद्योग हैं और 25 औद्योगिक क्लस्टर हैं. इनसे भारी मात्रा में सल्फर डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन होता है. लेकिन ताप बिजली परियोजनाओं की कोई निगरानी इस उत्सर्जन के लिए नहीं की जाती. इसके अलावा दिल्ली में 9,000 छोटे होटल और रेस्टोरेंट हैं जहां खाना पकाने के लिए कोयले का इस्तेमाल होता है. दिल्ली के 90 फीसदी लोक साफ ईंधन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन 10 फीसदी लोग अब भी लकड़ी और कोयले जैसे परंपरागत ईंधनों का इस्तेमाल करते हैं. दिल्ली की सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या पीएम 2.5 की बढ़ती मात्रा के लिए जिम्मेदार है.

अभी दिल्ली को लेकर चर्चा चल रही है लेकिन सच्चाई यह है कि देश के कई शहरों की यही हालत है. उत्तरी भारत में ज्यादा बुरी स्थिति है. पड़ोसी पाकिस्तान के लाहौर में भी बुरी स्थिति है. इसका मतलब यह है कि हमें पड़ोसी देश के साथ मिलकर इस समस्या से निपटने के लिए काम करना होगा. क्योंकि दोनों तरफ के लोग प्रभावित हो रहे हैं. पाकिस्तान के साथ सिर्फ हमारा इतिहास साझा नहीं है बल्कि भूगोल भी साझा है. इसलिए जब सीमा के इस पार के शहर प्रभावित होते हैं तो उस पार के शहर भी नहीं बचे रहते.

सबसे पहले तो हमें यह स्वीकारना होगा कि समस्या मौसमी नहीं बल्कि स्थायी है और किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है. नीति निर्माताओं को यह भी मानना पड़ेगा कि समस्या के समाधान के लिए कोई रेडिमेड समाधान नहीं है. कुछ आपातकालीन निर्णय जरूर लेने होंगे लेकिन दीर्घकालिक कदम जरूरी हैं. पहले की तरह अगर चीजें चलती रहीं तो वही होगा जो अब हो रहा है. बगैर धुंध के भी हमारे शहरों की हवा जहरीली ही रहती है.

दुनिया भर में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे ऐसी परिस्थितियों का सामना करने की रणनीति सीखी जा सकती है. इसमें जमीन के इस्तेमाल संबंधित कानूनों का नियमन, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दिया जाना, हरित क्षेत्रों तक जनता की पहुंच स्थापित करना, प्रदूषण के स्रोतों को सीमित करना आदि शामिल हैं. इसमें लोगों को जागरूक बनाना शामिल है ताकि भविष्य के लिए प्रदूषण मुक्त शहरों का निर्माण हो सके. जादू की कोई ऐसी छड़ी नहीं है जिससे हवा तुरंत साफ हो जाए. समाधान का सिर्फ यही रास्ता है कि चरणबद्ध ढंग से दीर्घकालिक कदम उठाए जाएं ताकि हमारे शहर रहने लायक बन सकें.

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