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कैदियों को अपमान और मौत के भय से मुक्त करना

देश की अपराध न्याय व्यवस्था को कैदियों को सुधार और पुनर्वास का अवसर देना चाहिए

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

15 सितंबर, 2017 को उच्चतम न्यायालय ने एक प्रगतिशील फैसले में उन कैदियों के परिवारों को मुआवजा देने के लिए निर्देश जारी किए जिनकी मौत अप्राकृतिक वजहों से हिरासत में हुई है. उच्चतम न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को यह निर्देश दिया है कि वे हिरासती मौतों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज करें. अदालत ने कैदियों के अधिकार, हिरासती मौतों, कैदियों की स्वास्थ्य और कानूनी सेवा के अधिकार, माॅडल जेल मैनुअल, जेलकर्मियों को संवेदनशील बनाने और खुली जेल जैसे विषयों पर निर्देश दिए हैं.

अदालती निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अदालत ने हिरासती मौतों को सिर्फ जेल प्रशासन का मामला नहीं माना. अदालत ने इसे सुधार और पुनर्वास की प्रक्रिया की नाकामी से जोड़ा है. हमारी न्याय व्यवस्था प्रतिशोध और प्रतिरोध पर अधिक निर्भर दिखती है.

पहले भी उच्चतम न्यायालय ने जेल सुधारों पर जो निर्देश दिए हैं, उन पर खास प्रगति नहीं हुई है. अप्रैल, 2015 में अदालत ने राज्यांे को यह निर्देश दिया था कि उन विचाराधीन कैदियों को रिहा करें जो अधिकतम सजा से आधे से अधिक वक्त से जेल में हैं. इसका पालन नहीं होते देख अदालत ने 10 अक्टूबर, 2017 को फिर से नया आदेश जारी किया है और महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को तय समय सीमा में जवाब देने को कहा है.

किसी को भी अपराधी कहा जा सकता है अगर उसने आपराधिक कानून के प्रावधानों के खिलाफ कोई काम किया हो. लेकिन अब यह सहमति बनती जा रही है कि आपराधिकता का दायरा इतना स्थायी नहीं है. इसमें वर्ग, शक्ति और सामाजिक मूल्यों की भी भूमिका है. 

पिछड़े वर्ग के लोग जेलों में अधिक हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी बताते हैं कि पिछड़े लोग अधिक दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. जेलों में बंद लोगों में से आधे से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुस्लिम समाज से हैं. यह कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी के मुकाबले अधिक है. इसके लिए उनका सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन भी जिम्मेदार है.

जेल की सजा व्यक्ति को पारिवारिक और सामाजिक सहयोग से अलग कर देती है. ऐसे में उनके लिए पुनर्वास का काम बेहद मुश्किल हो जाता है. पैरोल जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल जहां नहीं हो पाता, वहां पुनर्वास तो बहुत दूर की चीज लगती है. स्कैंडेवेयिन देशों में इस दिशा में काफी काम हुए हैं. डोमिनिकन रिपब्लिक ने जेलों के लिए कर्मचारी अलग से नियुक्त किए हैं. पुलिस के लोगों को यह काम नहीं दिया है. इसके अलावा हर कैदी को शिक्षा देने का काम भी शुरू किया है. ये प्रयोग भारत में भी किए जा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने जेलकर्मियों को संवेदनशील बनाने को भी कहा है. साथ ही काउंसलर और गैर सरकारी संगठनों को कैदियों के साथ जोड़ने की बात कही है. यह सब करने से पुनर्वास का काम आसान होगा. लेकिन इन निर्णयों का असर तब ही होगा जब ये ठीक से लागू हो पाएं. ये ठीक से तब ही लागू हो पाएंगी जब जेल सुधारों को लेकर व्यापक तौर पर हर स्तर पर चर्चा हो.

जेल सुधारों को सिर्फ जेलों के अंदर होने वाली हिंसा तक सीमित करना ठीक नहीं है. इसे सुधार की पूरी प्रक्रिया और जेलों का कुछ खास वर्गों को सजा देने का माध्यम बन जाने की दृष्टि से भी देखना जरूरी है. अदालत ने शोध और खुली जेल जैसी बातों का जिक्र करके इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं. दरअसल, जेल सुधार कैदियों को अपमान, भेदभाव और मृत्यु के भय से मुक्त करने की सोच के साथ होना चाहिए.

 
Updated On : 14th Nov, 2017
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