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मोदी और योगी

ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों एक ही लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं.

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

जब भारतीय जनता पार्टी ने यह तय किया कि हिंदू फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री होंगे तो आखिर क्यों कुछ लोग हैरान थे? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा भाजपा को भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में बढ़ने को कहती है। ऐसे में देश में सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ के चयन का स्पष्ट मतलब निकलता है। इससे यह पता चलता है कि सबको साथ लेकर चलने के नारों के बावजूद भाजपा के दीर्घकालिक लक्ष्य नहीं बदले। ऐसे में अगर गोरखनाथ मठ के धार्मिक प्रमुख आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने से 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत पक्की हो जाती है तो ऐसा करने से आखिर पार्टी क्यों परहेज करे?

मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के पसंद को लेकर कोई परेशानी नहीं है। दिक्कत है तो इस बात को लेकर न सिर्फ बहुत सारे लोग बल्कि मीडिया के अधिकांश लोग भी यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री रहते हुए और बाद में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने बांटने वाली हिंदुत्व की राजनीति को छोड़कर विकास की राजनीति की है। दरअसल, बतौर प्रधानमंत्री मोदी के तीन साल पूरे होने को हैं लेकिन इस बीच उन्होंने एक काम भी ऐसा नहीं किया जिससे यह लगे कि उनके मूल विचारों में कोई बदलाव हुआ है। अगर उन्हें और उनकी पार्टी को यह लगता कि सभी भारतीयों के बीच स्वीकार्य होने के लिए उन्हें मध्य मार्ग की ओर बढ़ना होगा तो वे लोगों के बीच मुस्लमानांे के प्रति नफरत बढ़ाने वाले बयान देने वाले योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों को काबू में रखते।  लेकिन मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया। इससे यह साबित होता है कि ऐसे लोग पार्टी के लिए बेहद अहम हैं। ये लोग मोदी जैसे लोगों से अपनी वैधता और ताकत हासिल करते हैं और बदले में पार्टी को उसके राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करते हैं।

कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अतिवादी लोगों को हाशिये पर रखना भाजपा की रणनीति का हिस्सा था और ऐसे ही एक व्यक्ति को देश के सबसे बड़े प्रदेश का मुखिया बना देने से उसे नुकसान हो सकता है। लेकिन पांच बार के सांसद योगी आदित्यनाथ और उनकी हिंदू युवा वाहिनी ने अब तक जो किया है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि मोदी ने अपनी थोड़ी उदार छवि गढ़ने की कोशिश की थी, उसे झटका लगा है। आखिर मोदी ने सबका साथ, सबका विकास के वादे के साथ योगी के वैमनस्य बढ़ाने वाले भाषणों का कहीं कोई मेल बैठ सकता है?

इन दोनों बातों का आपसी विरोध योगी के मुख्यमंत्री बनते ही दिखने लगा। योगी ने यह घोषणा की है कि उत्तर प्रदेश में सारे अवैध बूचड़खानों को बंद किया जाएगा। इनके बारे में यह संदेह है कि ये गोमांस का प्रसंस्करण करते हैं। इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। योगी की घोषणा के अगले दिन हथरस जिले में मीट बेचने वाले एक दुकान पर हमला हो गया। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में 15 ‘अवैध’ बूचड़खानों को बंद कराया गया। कानपुर, मेरठ और आजमगढ़ में भी इन्हें निशाना बनाया गया। इनमें से अधिकांश मुसलमानों के हैं इसलिए इन्हें निशाना बनाए जाने की वजह स्पष्ट तौर पर दिखती है। योगी ने पुलिस को ‘एंटी रोमियो दस्ता’ बनाने का भी निर्देश दिया। ताकि लड़कियों को राह चलते परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े। वास्तव में ये दस्ते भी मुस्लिम पुरूषों को तंग करने के लिए ही बनाए गए लगते हैं। योगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विवादित जमीन पर जहां पहले बाबरी मस्जिद थी, वहां फिर से राम मंदिर बनाने के अभियान को फिर से गति कैसे दें। लंबे समय से यह मामला चल रहा है लेकिन अचानक से यह फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में कभी भी पार्टी नहीं रहे भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर करके यह कहा है कि इसकी जल्द से जल्द सुनवाई हो और उच्चतम न्यायालय ने भी इस मामले को कोर्ट से बाहर सुलझाने की सलाह दी है।

कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या योगी को मुख्यमंत्री बनाने से मोदी के छवि को नुकसान होगा? इसके जवाब में हमें खुद से यह पूछना होगा कि क्या हिंदू राष्ट्र के वादे और भगवा विकास के वादे में कोई अंतर्विरोध है? 2002 के दंगों के बाद जब नरेंद्र मोदी ने विकास का ‘गुजरात माॅडल’ पेश किया तो लोग मोदी की मुस्लिम विरोधी छवि को भूल गए। मोदी इस बात में कामयाब हुए कि उनके विकास में कुछ पूंजीवादियों को फायदा हो लेकिन अधिकांश आम लोग पीछे छूट जाएं और विकास का भ्रम भी बना रहे। इस वजह से गुजरात में मुस्लिम इतने हाशिये पर चले गए कि उन्हें अपनी बात रखने में भी डर लगने लगा। मोदी के विकास का माॅडल एक ऐसा चारा है जो मतदाताओं के हिंदू राष्ट्र की भावना को ही मजबूत करता है।

2015 में दिल्ली और बिहार की करारी हार के बाद भाजपा के लिए अपनी रणनीति में फेरबदल करना अनिवार्य हो गया था। भाजपा ने यह काम विकास के जुमले के साथ-साथ मुस्लमानों के प्रति हिंदुओं में वैमनस्य का भाव बढ़ाकर बखूबी किया। उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए योगी आदित्यनाथ उपयोगी प्रचारक थे। उत्तर प्रदेश जीतने के बाद भाजपा इस बात को लेकर आश्वस्त दिख रही है कि विकास और हिंदुत्व की जुगलबंदी दूसरे जगहों पर भी काम करेगी। अब इसे सबकी पार्टी होने का ढोंग छोड़कर एक खास वर्ग के लिए काम करने की योजना पर स्पष्ट तौर पर बढ़ना चाहिए। इसके लिए उत्तर प्रदेश में योगी और दिल्ली में मोदी जैसे ध्रुवीकरण करने वाले नेता बेहद उपयोगी हैं।

Updated On : 13th Nov, 2017
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