ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

सैन्य जैकपाॅट का हाथ लगना

अमेरिका की सेवेंथ फ्लिट को काफी खतरा माना जाता था, अब इसे न सिर्फ एक बड़ा अवसर बल्कि इससे अधिक माना जा रहा है

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

भारत अमेरिका के सेवेंथ फ्लिट का हिस्सा होगा। यह भारत और अमेरिका के रिश्तों में आए बदलावों की रेखांकित करता है। 1971 में जब भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी की कामयाबी पक्की लग रही थी तो अमेरिका ने इसी फ्लिट से अपने सैनिकों को भेजा था। उस वक्त यह फ्टिल दक्षिण वियतनाम में थी। उसी साल अगस्त में भारत ने रूस के साथ एक समझौता किया था। इसके मुताबिक अगर भारत को किसी बाहरी ताकत से खतरा हो तो मदद के लिए रूस आगे आएगा। अमेरिकी सैनिकों को रोकने के लिए रूस के सैनिक भी आए और अमेरिकी खतरों को टाला जा सका।

शीत युद्ध के अंत के बाद और सोवियत संघ के विघटन के पहले ही भारत ने संकेत देने शुरू कर दिए। अगस्त, 1990 से फरवरी, 1991 के बीच चले खाड़ी युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिकी सैन्य विमानों को भारत में ईंधन भरने की अनुमति दी। लेकिन 2016 के अगस्त में जिस लाॅजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट यानी लिमोआ पर दोनों देशों ने दस्तखत किए हैं, उससे इन दोनों देशों की सेनाओं के बीच परस्पर सहयोग का नया युग शुरू होने वाला है। इस समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे की जमीन का इस्तेमाल दोबार ईंधन भरने, आपूर्ति करने, मरम्मत आदि के लिए कर सकते हैं। समझौते पर दस्तखत करते वक्त अगस्त, 2016 में पेंटागन में अमेरिकी रक्षा मंत्री एस्टन कार्टर ने कहा था कि लिमोआ से जब हम चाहें, हमारा एक साथ काम करना आसान होगा। उन्होंने कहा था कि इससे साझा अभियान काफी आसान और प्रभावी होगा। भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि संयुक्त अभियानों के लिए इससे एक-दूसरे के सैनिकों के लिए लाॅजिस्टिकल मदद मुहैया कराना आसान होगा। हमें पक्के तौर पर नहीं मालूम नहीं ऐसा लगता है कि लिमोआ के बाद भारतीय सैन्य अड्डों और बंदरगाहों पर सैन्य सामग्री और सैनिकों की तैनाती की सुविधा मिल जाएगी।

जमीनी स्तर पर लिमोआ के स्पष्ट होने में छह-सात महीने का वक्त लग गया। इस साल फरवरी में अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस डिफेंस ऐंड इंजीनियरिंग को सेवेंथ फ्लिट और उसकी सहयोगी जहाजांे के मरम्मत का एक ठेका मिला। कंपनी यह काम भारत में पिपावाव शिपयार्ड में करेगी। इसके बदले कंपनी को अगले पांच साल में 1.5 अरब डाॅलर मिलने का अनुमान है। 2015 में इस कंपनी ने इस शिपयार्ड को खरीदा था। भारत सरकार और गुजरात सरकार के सहयोग से कपंनी ने इस शिपयार्ड को अपग्रेड करके अमेरिकी नौसेना का अधिकृत ठेकेदार होने का दर्जा हासिल किया। 

यह महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार ने लिमोआ लागू करने को तब सार्वजनिक किया जब अमेरिकी नौसेना का रिलायंस के साथ करार हो गया। रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों को 2005 से प्रोत्साहन मिलना शुरू हुआ है। उस साल भारत सरकार ने विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए एक प्रावधान यह लगा दिया था कि उन्हें एक निश्चित मात्रा में वस्तुएं भारतीय उत्पादकों से खरीदनी होगी। इसके बाद विदेशी कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर साझाी कंपनियों में निवेश शुरू किया। डसाॅल्ट रिलायंस एयरोस्पेस इसलिए बनी ताकि रफैल करार की भारतीय जरूरतों को पूरा किया जा सके और भारत के मेक इन इंडिया नीति को भी बल मिले। 2005 की भारत की नीति से जिन भारतीय कंपनियों को फायदा मिल रहा है, उनके बारे में सच्चाई यह है कि उनकी हैसियत एक जूनियर पार्टनर से अधिक की नहीं है। रक्षा क्षेत्र में काम कर रही सरकारी कंपनियां इस स्थिति में थीं कि वे इन स्थितियों का फायदा उठा सकें लेकिन उन्हें निजी कंपनियों के चक्कर में जानबूझकर दरकिनार किया जा रहा है।

अमेरिका ने भारत को ‘बड़े रक्षा साझेदार’ का दर्जा दे दिया है। भारत अधिकांश आधुनिक सैन्य हथियार अमेरिकी और इजरायली कंपनियों से खरीद रहा है। वहीं ट्रंप सरकार के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन चीन को संतुलित करने के लिए भारत का सहयोग करेगा। इन सबसे यह साफ है कि भारत की निजी रक्षा कंपनियों को आने वाले दिनों में भारी मुनाफा होने वाला है। जब रिलायंस डिफेंस को अमेरिकी ठेका मिला तो इसके बाद कंपनी के एक प्रवक्ता की बातों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि ये कंपनियां मानकर चल रही हैं कि आने वाले दिनों में रक्षा क्षेत्र में वे सबसे आगे रहेंगी कुछ उसी तरह जिस तरह चीन को रोकने के लिए अमेरिका ने भारत को सबसे आगे कर दिया है। अनिल अंबानी ने अपने बड़े भाई मुकेश अंबानी के साथ नरेंद्र मोदी का उस दौर में समर्थन किया जब वे भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। उस निवेश का फायदा उन्हें बहुत जल्दी मिलता दिख रहा है।   

अमेरिका का सेवेंथ फ्लिट कभी भारत के लिए खतरे की घंटी था। लेकिन आज यह न सिर्फ एक सैन्य अवसर है बल्कि कुछ लोगों के लिए सोने की खान है।

 

Updated On : 13th Nov, 2017
Back to Top